बाल हितों की उपेक्षा का उदाहरण — संसाधनों के अभाव में खंडवा की बाल कल्याण समिति, पूरे निमाड़ में शिशु संरक्षण की गंभीर स्थिति
खंडवा (मध्यप्रदेश):
राज्य सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम 2015 (संशोधित 2021) की भावना के अनुरूप प्रत्येक जिले में बाल कल्याण समिति (CWC) को सशक्त, स्वतंत्र और बाल हितैषी वातावरण में कार्य करने का प्रावधान किया गया है। किंतु खंडवा जिले की स्थिति इस दिशा में बेहद चिंताजनक है।
6 बाय 8 फीट के कमरे में न्यायिक प्रक्रिया
खंडवा जिले की बाल कल्याण समिति मात्र 6 बाय 8 फीट के छोटे से कमरे में कार्य कर रही है।
यहां अध्यक्ष प्रवीण शर्मा (प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट समकक्ष) सहित तीन महिला सदस्य एक ही कमरे में बैठकर नाबालिग बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने को विवश हैं।
न तो यहां काउंसलिंग रूम है, न गोपनीय वार्ता की व्यवस्था, न कंप्यूटर-प्रिंटर जैसे आवश्यक उपकरण। वर्षों पुराने टूटे-फूटे फर्नीचर पर न्यायिक कार्य संचालित किया जा रहा है।
विभागीय उदासीनता और संसाधनों का दुरुपयोग
अध्यक्ष का कहना है कि समिति ने कई बार विभाग को मौखिक और लिखित रूप से भवन, फर्नीचर, तकनीकी उपकरण और परामर्श कक्ष की मांग की है, किंतु अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
उन्होंने कहा —
“राज्य सरकार समिति के संचालन के लिए नियमित वित्तीय व्यवस्था करती है, परंतु विभागीय स्तर पर संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो रहा। जब न्यायपीठ ही पुराने फर्नीचर पर बैठेगी और तकनीकी साधन नहीं होंगे, तो बच्चों के अधिकारों की रक्षा की प्रक्रिया कैसे सशक्त होगी?”
बालक/बालिका गृहों की बंदी से बढ़ी चुनौती
खंडवा जिले में पहले संचालित बालिका गृह ब्लैकलिस्ट होने के कारण बंद हो चुका है, वहीं बालक गृह भी लगभग एक वर्ष से बंद है।
इससे जिला स्तर पर ऐसे बच्चों के लिए अस्थायी आश्रय की भी सुविधा नहीं बची, जो घर से भागे हुए, परित्यक्त, या संकट की स्थिति में मिलते हैं।
विभाग द्वारा वन स्टॉप सेंटर (महिला सहायता केंद्र) में केवल बालिकाओं के लिए अस्थायी ठहराव की व्यवस्था की गई है, परंतु यह न तो दीर्घकालिक समाधान है, न ही अधिनियम के अनुरूप सुरक्षित विकल्प।
पूरे निमाड़ क्षेत्र में एक ही शिशु गृह
बाल संरक्षण की दृष्टि से स्थिति और भी गंभीर है।
पूरे निमाड़ क्षेत्र (खंडवा, खरगोन, बड़वानी, बुरहानपुर) में केवल एक ही संस्था —
“सहज समागम फाउंडेशन” (किलकारी शिशु गृह) — संचालित है,
जहां एक दिन से लेकर 6 वर्ष तक के बालक/बालिका को ही रखा जा सकता है।
इससे यह स्पष्ट है कि 6 वर्ष से अधिक आयु के बालक-बालिकाओं के लिए किसी भी जिले में वैकल्पिक संरक्षण गृह उपलब्ध नहीं है, जो कि किशोर न्याय अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है।
कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन
किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अनुसार प्रत्येक जिले में समिति हेतु —
स्वतंत्र भवन,
काउंसलिंग कक्ष,
महिला परामर्शदाता,
सुरक्षा व्यवस्था,
एवं बाल हितैषी माहौल
अनिवार्य है।
परंतु खंडवा में यह सब कागजों में सीमित रह गया है। समिति को जिस वातावरण में कार्य करना पड़ रहा है, वह अधिनियम की आत्मा के बिल्कुल विपरीत है।
तत्काल आवश्यक कदम
बाल कल्याण समिति एवं सामाजिक संगठनों ने विभाग से आग्रह किया है कि —
1. स्वतंत्र भवन एवं काउंसलिंग रूम का प्रावधान किया जाए।
2. फर्नीचर, कंप्यूटर, प्रिंटर एवं अन्य उपकरण शीघ्र उपलब्ध कराए जाएं।
3. बालक एवं बालिका गृहों का पुनर्संचालन या वैकल्पिक सुरक्षित केंद्र शुरू किए जाएं।
4. सहज समागम फाउंडेशन जैसे शिशु गृहों की क्षमता बढ़ाई जाए, ताकि छह वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के लिए भी देखभाल की व्यवस्था हो सके।
5. विभागीय जवाबदेही तय कर यह सुनिश्चित किया जाए कि सरकार द्वारा प्रदत्त वित्तीय सहायता वास्तव में बच्चों के हित में उपयोग हो।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सरकारी वित्तीय सहयोग और विभागीय क्रियान्वयन के बीच की दूरी बाल संरक्षण की सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है। जब न्यायिक संस्थाएँ ही संसाधनविहीन हों, तो “बच्चे पहले” की नीति केवल दस्तावेजों तक सीमित रह जाती है।












